कक्षा 12 हिंदी के लिए आत्मपरिचय पाठ योजना (Aatm Parichay Path Yojana)

आत्मपरिचय पाठ योजना | Aatm Parichay Path Yojana | आरोह भाग-2 | हिंदी अनिवार्य

नमस्कार शिक्षक साथियों! ‘शिक्षक कॉर्नर’ में आपका स्वागत है। आज हम RBSE कक्षा 12 हिंदी अनिवार्य के लिए NCERT की पुस्तक ‘आरोह भाग-2’ के काव्य खंड के पहले पाठ “हरिवंश राय बच्चन” की प्रसिद्ध कविता ‘आत्मपरिचय’ के लिए एक विस्तृत और गहन पाठ योजना प्रस्तुत कर रहे हैं। यह Aatm Parichay Path Yojana आपके कक्षा शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है, ताकि आपको विस्तृत व्याख्या, काव्य सौंदर्य, NCERT प्रश्नों के हल और परीक्षा-केंद्रित अभ्यास जैसी हर आवश्यक सामग्री एक ही स्थान पर मिल सके।

पाठ अवलोकन

विवरणजानकारी
कक्षा12
विषयहिंदी (अनिवार्य)
पुस्तकआरोह भाग-2 (काव्य खंड)
पाठ1. आत्मपरिचय
कविहरिवंश राय बच्चन
अनुमानित समय45 मिनट (1 कालांश)

शैक्षणिक उद्देश्य एवं सामग्री

सीखने के उद्देश्य (Learning Objectives)

  • विद्यार्थी कवि और संसार के बीच प्रीति-कलह के द्वंद्वात्मक संबंध को समझ सकेंगे।
  • विद्यार्थी बच्चन के ‘हालावादी दर्शन’ का सार तत्व ग्रहण कर सकेंगे।
  • विद्यार्थी कविता में प्रयुक्त विरोधाभास अलंकार और उसकी प्रभावशीलता का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • विद्यार्थी कविता की भाषा, शैली और गेयता की विशेषताओं को पहचान सकेंगे।
  • विद्यार्थी RBSE परीक्षा पैटर्न के अनुसार सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम हो सकेंगे।

आवश्यक सामग्री (Required Materials)

  • पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’
  • श्यामपट्ट/व्हाइटबोर्ड और मार्कर/चॉक
  • कवि हरिवंश राय बच्चन का चित्र (वैकल्पिक)

कवि परिचय: हरिवंश राय बच्चन

1. जीवन परिचय

हरिवंश राय बच्चन का जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। वे 1942 से 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और फिर आकाशवाणी व विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर कार्य किया। उनका निधन सन् 2003 में मुंबई में हुआ।

2. साहित्यिक परिचय

बच्चन जी को ‘हालावादी दर्शन’ का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता के स्थान पर सीधी-सादी, जीवंत भाषा और गेय शैली में अपनी बात कही। उनके काव्य में व्यक्तिगत अनुभूतियों की ईमानदार अभिव्यक्ति मिलती है, जो उनकी लोकप्रियता का मुख्य आधार है। उनकी कविताओं में जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण है, जिसमें वे दुनिया से प्रेम भी करते हैं और उससे कलह भी।

3. प्रमुख रचनाएँ

काव्य संग्रह: मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल-अंतर, सतरंगिणी, नए पुराने झरोखे आदि।
आत्मकथा (चार खंड): क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
अनुवाद: हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ।
उनका संपूर्ण वाङ्मय ‘बच्चन ग्रंथावली’ के नाम से दस खंडों में प्रकाशित है।

4. भाषा-शैली

बच्चन जी की भाषा आम बोलचाल की खड़ी बोली है, जो सीधी, सरल और हृदयस्पर्शी है। उनकी शैली संवेदनसिक्त और गेय है, जिसके कारण उनकी कविताएँ आसानी से गुनगुनाई जा सकती हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में तत्सम शब्दों के साथ-साथ तद्भव और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी सुंदर प्रयोग किया है।

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया (कक्षा के लिए विस्तृत गाइड)

1. पूर्व ज्ञान से जोड़ना (Engage – 5 मिनट)

कक्षा की शुरुआत इन प्रश्नों से करें ताकि विषय के प्रति छात्रों की रुचि जागृत हो सके:

  • क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है कि आप इस दुनिया से प्रेम भी करते हैं और कभी-कभी इससे ऊब भी जाते हैं?
  • ‘परिचय’ देने का क्या अर्थ होता है? हम अपना परिचय कैसे देते हैं?
  • क्या सुख और दुःख, हँसी और रोना एक साथ संभव है? कैसे?
2. पाठ की प्रस्तुति (Explore & Explain – 20 मिनट)

सस्वर वाचन: उचित हाव-भाव, लय और आरोह-अवरोह के साथ कविता का सस्वर वाचन करें।

पद्यांश-वार विस्तृत व्याख्या:

पद्यांश 1: “मैं जग-जीवन का भार… गान किया करता हूँ!”

शब्दार्थ: जग-जीवन – सांसारिक जीवन, झंकृत – झंकार युक्त, स्नेह-सुरा – प्रेम रूपी शराब।
सरलार्थ: कवि कहते हैं कि वे सांसारिक जिम्मेदारियों का बोझ लिए हुए घूमते हैं, फिर भी उनके जीवन में प्रेम भरा हुआ है। उनके जीवन रूपी वीणा के तारों को किसी ने प्रेम से छूकर संगीतमय कर दिया है। वे उसी प्रेम की मदिरा में डूबे रहते हैं और कभी संसार की परवाह नहीं करते। संसार केवल उन्हीं लोगों की प्रशंसा करता है जो उसका गुणगान करते हैं, जबकि कवि अपने मन के गीतों में ही मग्न रहते हैं।

पद्यांश 2: “मैं निज उर के उद्‌गार… मस्त बहा करता हूँ!”

शब्दार्थ: उर – हृदय, उद्‌गार – भाव, उपहार – भेंट, भाता – अच्छा लगता, भव-सागर – संसार रूपी सागर, मौजों – लहरों।
सरलार्थ: कवि अपने हृदय के भावों और भेंटों को लिए घूमते हैं। उन्हें यह अधूरा संसार पसंद नहीं है, इसलिए वे अपनी कल्पनाओं का एक प्रेमपूर्ण संसार अपने साथ लिए फिरते हैं। वे अपने हृदय में वियोग की अग्नि जलाकर उसी में जलते रहते हैं और सुख-दुःख दोनों ही स्थितियों में समान भाव से मग्न रहते हैं। संसार इस भवसागर से पार उतरने के लिए नाव बनाता है, पर कवि संसार की लहरों पर ही मस्ती से बहते हैं।

पद्यांश 3: “मैं यौवन का उन्माद… सीखा ज्ञान भुलाना!”

शब्दार्थ: उन्माद – पागलपन, अवसाद – दुःख, दाना – ज्ञानी, मूढ़ – मूर्ख।
सरलार्थ: कवि कहते हैं कि उन पर जवानी का पागलपन सवार है, लेकिन इस पागलपन में भी दुःख छिपा है। वे अपने प्रिय की यादों में खोए रहते हैं, जो उन्हें बाहर से तो हँसाती है पर अंदर से रुलाती है। कवि कहते हैं कि सत्य को जानने के लिए कई लोगों ने प्रयत्न किए पर कोई जान नहीं पाया। जहाँ ज्ञानी और समझदार लोग होते हैं, वहीं नादान भी होते हैं। फिर यह संसार मूर्ख ही है जो सांसारिक ज्ञान के पीछे भाग रहा है। इसलिए कवि सीखे हुए सांसारिक ज्ञान को भूलना सीख रहे हैं।

पद्यांश 4: “मैं और, और जग और… भाग लिए फिरता हूँ।”

शब्दार्थ: वैभव – धन-संपत्ति, पग – पैर, रोदन – रोना, राग – प्रेम, प्रासाद – महल, निछावर – कुर्बान।
सरलार्थ: कवि कहते हैं कि मुझमें और संसार में कोई संबंध नहीं है, क्योंकि दोनों का स्वभाव विपरीत है। मैं न जाने कितने संसार रोज अपनी कल्पना में बनाकर मिटाता हूँ। यह संसार जिस धरती पर धन-संपत्ति जोड़ता है, मैं उसे हर कदम पर ठुकराता हूँ। मैं अपने रोने में भी प्रेम का संगीत लिए फिरता हूँ और मेरी शीतल वाणी में भी विद्रोह की आग है। मेरे पास प्रेम का वह खँडहर है, जिस पर राजाओं के महल भी कुर्बान हैं।

पद्यांश 5: “मैं रोया, इसको तुम… संदेश लिए फिरता हूँ!”

शब्दार्थ: दीवाना – पागल, मादकता – नशा, निःशेष – संपूर्ण।
सरलार्थ: कवि कहते हैं कि जब मैं प्रेम की पीड़ा में रोया तो संसार ने उसे गाना कह दिया, और जब मेरा दर्द शब्दों में फूटा तो उसे छंद बनाना कह दिया। मैं तो एक प्रेम-दीवाना हूँ, यह संसार मुझे कवि के रूप में क्यों अपनाता है? मैं तो दीवानों का वेश धारण करके घूमता हूँ और अपने जीवन में प्रेम का संपूर्ण नशा लिए फिरता हूँ। मैं प्रेम की मस्ती का वह संदेश लिए घूम रहा हूँ जिसे सुनकर यह संसार झूम उठे, झुक जाए और आनंद में लहराए।

3. सौंदर्य बोध (Elaborate – 10 मिनट)

भाव पक्ष: इस कविता में कवि ने अपने और संसार के द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर किया है। यह बच्चन के ‘हालावादी दर्शन’ का मूल है, जहाँ व्यक्ति दुनिया के कष्टों को सहते हुए भी अपनी मस्ती और प्रेम में डूबा रहता है। कविता का मूल भाव ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ है, जैसे – रोदन में राग, शीतल वाणी में आग।

कला पक्ष:

  • भाषा: सरल, सहज और प्रवाहमयी खड़ी बोली, जिसमें तत्सम शब्दावली की प्रमुखता है।
  • शैली: आत्मपरिचय की शैली ‘मैं’ शैली (उत्तम पुरुष) में है। यह शैली गेय और संगीतात्मक है।
  • अलंकार: ‘स्नेह-सुरा’, ‘भव-सागर’, ‘साँसों के दो तार’ में रूपक अलंकार है। ‘जग-जीवन’, ‘बना-बना’ में अनुप्रास व पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘शीतल वाणी में आग’, ‘रोदन में राग’ में विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग है। ‘मैं और, और जग और’ में यमक अलंकार है।
  • रस: कविता में श्रृंगार रस के वियोग और संयोग दोनों पक्षों का सुंदर चित्रण है।
4. मूल्यांकन (Evaluate – 10 मिनट)

कक्षा-कार्य: छात्रों से पूछें: ‘शीतल वाणी में आग’ का क्या आशय है? कवि को संसार अपूर्ण क्यों लगता है?

गृहकार्य: NCERT अभ्यास के प्रश्न संख्या 1, 3, और 4 तथा RBSE परीक्षा केंद्रित अभ्यास से सप्रसंग व्याख्या का प्रश्न हल करने के लिए दें।

NCERT अभ्यास-प्रश्नों के विस्तृत हल

प्रश्न 1: कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर ‘मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ’- विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?

उत्तर: इन विपरीत लगने वाले कथनों का आशय यह है कि कवि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते सांसारिक दायित्वों और कर्तव्यों से विमुख नहीं है। वह अपने सभी उत्तरदायित्वों को निभाता है, यही ‘जग-जीवन का भार’ है। परंतु, दूसरी ओर वह सांसारिक रीति-रिवाजों और व्यर्थ की आलोचनाओं की परवाह नहीं करता। वह वही करता है जो उसके मन को अच्छा लगता है। इस प्रकार, कवि सांसारिक होकर भी सांसारिकता से मुक्त है।

प्रश्न 2: जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं- कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?

उत्तर: ‘दाना’ का अर्थ है ज्ञानी या चतुर और ‘नादान’ का अर्थ है अज्ञानी या मूर्ख। कवि ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि इस संसार में हर तरह के लोग रहते हैं। जहाँ सांसारिक ज्ञान और वैभव को एकत्र करने वाले चतुर लोग हैं, वहीं सांसारिक माया-मोह से दूर रहने वाले नादान लोग भी हैं। कवि के अनुसार, जो लोग सांसारिक लाभ-हानि के चक्कर में पड़कर सत्य को जानने का प्रयास करते हैं, वे नादान हैं।

प्रश्न 3: ‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’ पंक्ति में ‘और’ शब्द की विशेषता बताइए।

उत्तर: इस पंक्ति में ‘और’ शब्द का तीन बार प्रयोग हुआ है और तीनों बार इसका अर्थ भिन्न है, इसलिए यहाँ यमक अलंकार है।
पहला ‘और’: यह कवि के लिए प्रयुक्त हुआ है और इसका अर्थ है ‘अन्य’ या ‘भिन्न’। कवि का स्वभाव अलग है।
दूसरा ‘और’: यह संसार के लिए प्रयुक्त हुआ है और इसका अर्थ भी ‘अन्य’ या ‘भिन्न’ है। संसार का स्वभाव अलग है।
तीसरा ‘और’: यह योजक (Conjunction) के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जो कवि और संसार को जोड़ने का काम करता है।
इस प्रकार, इस शब्द के प्रयोग से कवि ने अपने और संसार के बीच की भिन्नता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।

प्रश्न 4: शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?

उत्तर: ‘शीतल वाणी में आग’ एक विरोधाभासी कथन है। इसका अभिप्राय यह है कि कवि की वाणी यद्यपि कोमल और शीतल है, परंतु उसके विचारों में क्रांति, विद्रोह और जोश की भावना भरी हुई है। वह अपने गीतों के माध्यम से समाज की कुरीतियों और जड़ परंपराओं पर प्रहार करता है। उसकी शीतल वाणी में प्रेम की तड़प की ऊष्मा भी है और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध विद्रोह की आग भी है।

RBSE परीक्षा-केंद्रित अभ्यास

कवि परिचय (उत्तर सीमा 80 शब्द)

प्रश्न: कवि हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर: हालावादी दर्शन के प्रवर्तक कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म 1907 में इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने छायावादी काव्य की सूक्ष्मता के स्थान पर सीधी, सरल और गेय शैली को अपनाया। उनकी कविताओं में व्यक्तिगत प्रेम, मस्ती और सामाजिक यथार्थ की ईमानदार अभिव्यक्ति मिलती है। ‘मधुशाला’ उनकी कीर्ति का आधार स्तंभ है। उनकी आत्मकथा ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ हिंदी गद्य की एक अनमोल धरोहर है। उनकी भाषा सहज खड़ी बोली है, जिसमें संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।

सप्रसंग व्याख्या

पद्यांश: “मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ, शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ, हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर, मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।”

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है।
प्रसंग: यहाँ कवि ने अपने विरोधाभासी जीवन के रहस्य को उद्घाटित किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि मैं अपने रुदन में भी प्रेम के गीत गाता हूँ और मेरी शीतल वाणी में भी विद्रोह की अग्नि समाहित है। मेरे पास मेरे प्रेम की स्मृतियों का वह खँडहर है, जिसका मूल्य इतना अधिक है कि उस पर राजाओं के बड़े-बड़े महल भी न्योछावर किए जा सकते हैं। अर्थात्, प्रेम के सामने सांसारिक वैभव तुच्छ है।
विशेष: (1) भाषा सरल और भावपूर्ण है। (2) ‘रोदन में राग’ और ‘शीतल वाणी में आग’ में विरोधाभास अलंकार है। (3) वियोग श्रृंगार रस की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। (4) मुक्त छंद का प्रयोग है।

बहुचयनात्मक प्रश्न (MCQ)

1. ‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि जीवन में क्या लिए फिरता है?

(क) पैसा
(ख) प्यार
(ग) कार्यालय
(घ) घृणा

2. कवि कैसा संसार लिए फिरता है?

(क) यथार्थ
(ख) आदर्श
(ग) स्वप्नों का
(घ) भौतिक
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (उत्तर सीमा 20 शब्द)

प्रश्न 1: कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करना चाहता?
उत्तर: कवि जग का ध्यान इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि वह अपने प्रेम और मस्ती की दुनिया में मग्न है और सांसारिक बातों की परवाह नहीं करता।

प्रश्न 2: कवि के रोने को संसार क्या समझता है?
उत्तर: कवि के रोने अर्थात् उसकी प्रेम-पीड़ा की अभिव्यक्ति को संसार गाना समझता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (उत्तर सीमा 40 शब्द)

प्रश्न 1: ‘आत्मपरिचय’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: ‘आत्मपरिचय’ कविता का प्रतिपाद्य है व्यक्ति और समाज के बीच के खट्टे-मीठे संबंधों को उजागर करना। कवि यह संदेश देना चाहता है कि संसार से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं है। व्यक्ति को सांसारिक कष्टों के बीच भी प्रेम और मस्ती के साथ जीवन जीना चाहिए।

प्रश्न 2: ‘मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ’ – पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि कवि प्रेम रूपी मदिरा को पीकर उसी के नशे में डूबा रहता है। उसे सांसारिक मोह-माया या लोक-निंदा की कोई चिंता नहीं रहती। प्रेम ही उसके जीवन का मुख्य आधार और उसकी मस्ती का कारण है।

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (उत्तर सीमा 60-80 शब्द)

प्रश्न 1: ‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि ने अपने और संसार के बीच द्वंद्वात्मक संबंधों को व्यक्त किया है। कविता के आधार पर इस ‘प्रीतिकलह’ के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: ‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि अपने और संसार के संबंधों का एक विरोधाभासी चित्र प्रस्तुत करते हैं। वे ‘जग-जीवन का भार’ उठाते हैं, जो समाज के प्रति उनके दायित्व को दिखाता है, लेकिन वे ‘जग का ध्यान’ नहीं करते, जो उनकी सामाजिक मान्यताओं से असहमति को दर्शाता है। संसार धन-वैभव जोड़ता है, जिसे कवि ठुकराता है। यह संबंध प्रेम और कलह का मिला-जुला रूप है, जहाँ कवि संसार में रहते हुए भी उससे अलग अपनी एक प्रेम और मस्ती की दुनिया बसाता है।

प्रश्न 2: ‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर हरिवंश राय बच्चन के व्यक्तित्व की किन्हीं तीन विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: कविता के आधार पर कवि के व्यक्तित्व की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं: (1) **प्रेम और मस्ती:** वे प्रेम को जीवन का सार मानते हैं और उसी में मग्न रहते हैं। (2) **फक्कड़पन और बेपरवाही:** वे सांसारिक चिंताओं और लोक-निंदा की परवाह नहीं करते। (3) **विरोधाभासी जीवन:** वे अपने जीवन में सुख-दुःख, रोदन-राग जैसे विपरीत भावों को एक साथ लेकर चलते हैं, जो उनके जीवन-दर्शन की गहराई को दिखाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस कविता में ‘हालावादी दर्शन’ कैसे झलकता है?

यह कविता दुनिया के दुखों की परवाह न करते हुए प्रेम और मस्ती में जीने का संदेश देती है। ‘स्नेह-सुरा का पान करना’, ‘जग का ध्यान न करना’, और ‘भव मौजों पर मस्त बहना’ जैसी पंक्तियाँ बच्चन के हालावादी दर्शन को दर्शाती हैं, जिसका अर्थ है- वर्तमान में जीना और हर पल को पूरी तन्मयता से जीना।

कवि स्वयं को ‘दीवाना’ क्यों कहता है, ‘कवि’ क्यों नहीं?

कवि स्वयं को ‘दीवाना’ इसलिए कहता है क्योंकि वह सांसारिक समझदारी और रीति-रिवाजों की परवाह नहीं करता और अपने प्रेम की धुन में मग्न रहता है। वह अपनी अनुभूतियों को सीधे-सीधे व्यक्त करता है, न कि एक पेशेवर कवि की तरह सोच-समझकर छंदों की रचना करता है। उसके लिए प्रेम की दीवानगी ही उसकी असली पहचान है।

हम आशा करते हैं कि हरिवंश राय बच्चन की ‘आत्मपरिचय’ कविता पर आधारित यह विस्तृत पाठ योजना आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी। इस Aatm Parichay Path Yojana को शिक्षकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है ताकि आपको एक ही स्थान पर संपूर्ण शिक्षण और परीक्षा सामग्री मिल सके। अपने विचार और सुझाव हमें कमेंट्स में अवश्य बताएं।

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