भक्तिन सप्रसंग व्याख्या | कक्षा 12 हिंदी आरोह | Saprasang Vyakhya | Class 12 Hindi Aroh
नमस्ते विद्यार्थियों! इस लेख में हम कक्षा 12 हिंदी ‘आरोह’ के पाठ ‘भक्तिन’ के लिए सभी महत्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या (Saprasang Vyakhya) प्रदान कर रहे हैं। यह आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस लेख में आप क्या पढ़ेंगे
पाठ अवलोकन
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पाठ का नाम | भक्तिन |
| लेखिका | महादेवी वर्मा |
| विधा | संस्मरणात्मक रेखाचित्र |
| संग्रह | ‘स्मृति की रेखाएँ’ से संकलित |
भक्तिन सप्रसंग व्याख्या 1
“सेवक-धर्म में हनुमान जी से… गद्गद हो उठी।”
कठिन शब्दार्थ: स्पर्धा करना: बराबरी करना, मुकाबला करना। अनामधन्या: जिसका नाम कोई न जानता हो (पर वह धन्य है)। दुर्वह: जिसे ढोना (उठाना) कठिन हो। कपाल: माथा। इतिवृत्त: कहानी, पिछला हाल। कवित्वहीन: जिसमें कोई कविता न हो, सादा।
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, महादेवी वर्मा द्वारा रचित संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘भक्तिन’ से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में, लेखिका पहली बार भक्तिन से मिलने और उसका नया नाम ‘भक्तिन’ रखने की घटना का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या:
लेखिका बताती हैं कि भक्तिन की सेवा भावना की तुलना केवल हनुमान जी से की जा सकती है, जो बिना किसी स्वार्थ के सेवा करते हैं। भक्तिन का असली नाम ‘लछमिन’ (लक्ष्मी) था, जो धन-दौलत का प्रतीक है। लेकिन उसका जीवन घोर गरीबी में बीता, जो उसके नाम के बिल्कुल उल्टा था। लेखिका कहती हैं कि भक्तिन यह बात समझती थी, इसीलिए वह अपना असली नाम किसी को बताती नहीं थी। जब लेखिका ने भक्तिन के गले में कंठी माला देखकर उसका नया नाम ‘भक्तिन’ रखा, तो वह इस सादे नाम को पाकर भी बहुत खुश (गद्गद) हो गई।
विशेष:
1. लेखिका ने भक्तिन की सेवा-भावना की तुलना हनुमान जी से करके उसके चरित्र को ऊँचा उठाया है।
2. ‘लक्ष्मी’ नाम और गरीबी के जीवन में विरोधाभास अलंकार है।
3. भाषा सरल, तत्सम शब्दों (दुर्वह, इतिवृत्त) से युक्त और आत्मीय है।
भक्तिन सप्रसंग व्याख्या 2
“भक्तिन के जीवन का इतिवृत्त… मर्मव्यथा व्यक्त की।”
कठिन शब्दार्थ: इतिवृत्त: कहानी, इतिहास। विमाता: सौतेली माँ। किंवदंती: सुनी-सुनाई बात, लोक कथा। गौना: विवाह के बाद वधू का ससुराल जाना। मरणांतक: मृत्यु तक पहुँचाने वाला (जानलेवा रोग)। अप्रत्याशित अनुग्रह: अचानक मिली कृपा (मेहरबानी)। मर्मव्यथा: मन का गहरा दुःख।
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, महादेवी वर्मा द्वारा रचित संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘भक्तिन’ से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में, लेखिका भक्तिन के दुखद बचपन और उसकी सौतेली माँ के कठोर व्यवहार का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या:
लेखिका बताती हैं कि भक्तिन का बचपन बहुत दुःख भरा था। 5 साल की उम्र में शादी और 9 साल में गौना करके उसे ससुराल भेज दिया गया क्योंकि उसकी सौतेली माँ उससे प्रेम नहीं करती थी। जब भक्तिन के पिता गंभीर रूप से बीमार हुए, तो सौतेली माँ ने मृत्यु का समाचार भी देर से भेजा। भक्तिन की सास ने भी उसे यह बात नहीं बताई और बहाना बनाकर मायके भेज दिया। जब भक्तिन अपने गाँव पहुँची, तब तक पिता की मृत्यु हो चुकी थी। सौतेली माँ के बुरे व्यवहार से दुखी होकर वह बिना पानी पिए ही ससुराल लौट आई। उसने अपना सारा गुस्सा अपनी सास पर निकाला और पति पर गहने फेंककर पिता की मृत्यु का दुःख प्रकट किया।
विशेष:
1. यह गद्यांश समाज में सौतेली माँ की छवि और स्त्री के प्रति होने वाले अन्याय को दर्शाता है।
2. भक्तिन के स्वाभिमानी और विद्रोही स्वभाव की पहली झलक यहाँ मिलती है।
3. भाषा चित्रात्मक है (जैसे ‘पैरों में पंख लगा दिए थे’)।
भक्तिन सप्रसंग व्याख्या 3
“भोजन के समय जब मैंने… प्रमाणपत्र दे डाले हैं।”
कठिन शब्दार्थ: निर्दिष्ट: बताया गया, तय किया गया। तुषारपात करना: ओले बरसाना (यहाँ: उत्साह ठंडा कर देना)। हतबुद्धि: हैरान, जिसकी बुद्धि काम न करे। खरी: ज़्यादा सिकी हुई (कड़क)। कलाबत्तू: रेशम और सोने-चाँदी के तार (यहाँ: कीमती या शाही खाना)।
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, महादेवी वर्मा द्वारा रचित संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘भक्तिन’ से लिया गया है।
प्रसंग:
यह प्रसंग उस समय का है जब भक्तिन ने पहली बार लेखिका (महादेवी) के लिए खाना बनाया।
व्याख्या:
जब भक्तिन ने बड़े गर्व से लेखिका की थाली में मोटी-मोटी, जली हुई सी रोटियाँ और गाढ़ी दाल परोसी, तो लेखिका ने हैरान होकर पूछा कि यह क्या बनाया है? भक्तिन हैरान रह गई। उसने सफाई देते हुए कहा कि रोटियाँ अच्छी सेंकने में थोड़ी ज़्यादा कड़क हो गई हैं, पर अच्छी हैं। दाल बनी है तो सब्जी की क्या ज़रूरत, शाम को बना देगी। दूध-घी लेखिका को पसंद नहीं, नहीं तो सब ठीक होता। अगर इससे भी काम न चले, तो वह चटनी या गुड़ दे सकती है। भक्तिन ने तर्क दिया कि शहर के लोग क्या कोई शाही खाना खाते हैं? वह फूहड़ नहीं है, उसकी खाना बनाने की कला की तारीफ तो उसके ससुराल वाले भी करते थे।
विशेष:
1. यह अंश शहरी और देहाती (गाँव) जीवनशैली के अंतर को हास्यपूर्ण ढंग से दिखाता है।
2. भक्तिन के दृढ़ और तर्कशील स्वभाव का पता चलता है।
3. भाषा में देहाती शब्दों का पुट (असर) है।
भक्तिन सप्रसंग व्याख्या 4
“भक्तिन अच्छी है, यह… यथाविधि निष्पन्न होता रहा।”
कठिन शब्दार्थ: दुर्गुण: बुरी आदत, अवगुण। अंतरहित होना: गायब हो जाना। शास्त्रार्थ: शास्त्रों पर बहस। अकुंठित: बिना संकोच या झिझक के। चूड़ाकर्म: मुंडन संस्कार (सिर के बाल मुंडवाना)। निष्पन्न होना: पूरा होना।
संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, महादेवी वर्मा द्वारा रचित संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘भक्तिन’ से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में, लेखिका भक्तिन के स्वभाव की कमियों (अवगुणों) और उसके तर्क देने के अजीब ढंग का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या:
लेखिका कहती हैं कि भक्तिन को सिर्फ ‘अच्छा’ कहना कठिन है, क्योंकि उसमें भी कमियाँ थीं। वह सच को घुमा-फिराकर बताती थी, ताकि लेखिका को गुस्सा न आए। वह लेखिका के इधर-उधर पड़े पैसों को उठाकर मटकी में छिपा देती थी, लेकिन इसे चोरी नहीं मानती थी (बल्कि सँभालकर रखना मानती थी)। जब लेखिका ने उसे सिर मुंडवाने से रोका (क्योंकि लेखिका को यह पसंद नहीं था), तो भक्तिन ने तुरंत शास्त्र का तर्क दिया कि “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध”। यह बात किस शास्त्र में लिखी है, यह कोई नहीं जानता था, लेकिन भक्तिन के इस तर्क के आगे लेखिका को हार माननी पड़ी और भक्तिन हर बृहस्पतिवार को अपना मुंडन कराती रही।
विशेष:
1. यह अंश भक्तिन के दृढ़ स्वभाव और अपनी बात मनवाने के तरीके को दिखाता है।
2. भक्तिन अपनी छोटी-मोटी गलतियों के लिए भी अजीब तर्क गढ़ लेती थी।
3. भाषा सरल और व्यंग्यात्मक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भक्तिन सप्रसंग व्याख्या PDF (Download)
विद्यार्थियों की सुविधा के लिए, हमने ‘भक्तिन’ पाठ की सभी महत्वपूर्ण सप्रसंग व्याख्या को एक PDF फाइल में संकलित किया है।
(इस PDF में आपको पाठ का सारांश और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर भी बोनस के तौर पर मिलेंगे।)
यह लेख कक्षा 12 हिंदी ‘आरोह’ के पाठ ‘भक्तिन’ की सप्रसंग व्याख्या (Bhaktin Saprasang Vyakhya) का संपूर्ण विश्लेषण प्रदान करता है। इसमें सभी महत्वपूर्ण गद्यांशों का संदर्भ, प्रसंग, कठिन शब्दार्थ और विशेष, परीक्षा के दृष्टिकोण से शामिल किया गया है।
हम आशा करते हैं कि ‘भक्तिन’ पाठ की सप्रसंग व्याख्या पर आधारित यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा। यह आपको परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मदद करेगा।
