बाज़ार दर्शन NCERT समाधान (Bazar Darshan Question Answer)

बाज़ार दर्शन NCERT समाधान | Bazar Darshan Question Answer | जैनेंद्र कुमार | कक्षा 12 हिंदी

नमस्ते विद्यार्थियों! ‘हिंदी की पाठशाला’ में आपका स्वागत है। इस लेख में, हम कक्षा 12 हिंदी अनिवार्य की पुस्तक ‘आरोह भाग-2’ के गद्य खंड के पाठ 11, ‘बाज़ार दर्शन’ (लेखक : जैनेंद्र कुमार) के लिए एक सम्पूर्ण गाइड प्रदान कर रहे हैं। यहाँ आपको बाज़ार दर्शन NCERT समाधान (Bazar Darshan Question Answer) के साथ-साथ, ‘पाठ के आसपास’ और ‘भाषा की बात’ के हल मिलेंगे।

पाठ अवलोकन

विवरणजानकारी
कक्षा12
विषय हिंदी (अनिवार्य)
पुस्तक आरोह भाग-2 (गद्य खंड)
पाठ संख्या11
पाठ का नाम बाज़ार दर्शन
लेखक जैनेंद्र कुमार
विधा विचार-प्रधान निबंध

लेखक परिचयः जैनेंद्र कुमार

जैनेंद्र कुमार (जन्म 1905) को हिंदी में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार के रूप में प्रतिष्ठा मिली। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से एक सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा का प्रवर्तन किया। ‘त्यागपत्र’ और ‘पाज़ेब’ उनकी कालजयी रचनाएँ हैं।

पाठ सारांश: बाज़ार दर्शन

‘बाज़ार दर्शन’ एक विचार-प्रधान निबंध है, जिसमें लेखक ने उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद के खतरों पर चर्चा की है। यह पाठ बताता है कि बाज़ार का जादू ‘खाली मन’ और ‘भरी जेब’ पर कैसे काम करता है और भगत जी जैसे ‘भरे मन’ वाले लोग ही बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं।

सप्रसंग व्याख्याः बाज़ार दर्शन

‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के महत्वपूर्ण गद्यांशों का विस्तृत विश्लेषण पढ़ें। इसमें ‘बाज़ार का जादू’, ‘खाली मन’ और ‘अनीति-शास्त्र’ जैसे परीक्षा के लिए उपयोगी सभी अंशों का संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और विशेष शामिल है।

मूल भाव / प्रतिपाद्य

मूल भाव (पाठ क्या सिखाता है): ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ हमें सिखाता है कि हमें बाज़ार का उपयोग केवल अपनी वास्तविक ‘ज़रूरतों’ को पूरा करने के लिए करना चाहिए। यदि हम बाज़ार की चमक-दमक और ‘पर्चेजिंग पावर’ के दिखावे में फँसते हैं, तो बाज़ार हममें असंतोष, ईर्ष्या और लालच पैदा करके हमें मानसिक रूप से बेकार बना सकता है। यह पाठ संयम और संतोष के महत्व को समझाता है।

प्रतिपाद्य (लेखक क्या कहना चाहते हैं): इस निबंध के माध्यम से जैनेंद्र कुमार यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि उपभोक्तावादी संस्कृति व्यक्ति को गुलाम बनाती है। वे ‘पर्चेजिंग पावर’ को शैतानी शक्ति मानते हैं, जो बाज़ार में ‘बाज़ारूपन’ (कपट) को बढ़ावा देती है। लेखक स्पष्ट करना चाहते हैं कि जो अर्थशास्त्र (Economics) ऐसे शोषक बाज़ार को बढ़ावा देता है, वह वास्तव में ‘अनीति-शास्त्र’ है, क्योंकि यह लोगों के बीच सद्भाव को नष्ट करता है।

NCERT समाधान (पाठ के साथ)

प्रश्न 1: बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

उत्तर: बाज़ार का जादू चढ़ने पर: जब बाज़ार का जादू चढ़ता है, तो मनुष्य बाज़ार की आकर्षक चीज़ों के मोह में फँस जाता है। उसे सभी वस्तुएँ ज़रूरी और आराम बढ़ाने वाली लगती हैं। वह फालतू चीज़ें खरीदकर खुश होता है, भले ही बाद में वे बाधा उत्पन्न करें।

बाज़ार का जादू उतरने पर: जब जादू उतरता है, तो उसे पता चलता है कि फैंसी चीज़ों की बहुतायत आराम में मदद नहीं, बल्कि खलल (बाधा) ही डालती है। उसे अपनी खरीदारी पर पछतावा होता है और वह असंतोष व ईर्ष्या से भर जाता है।

प्रश्न 2: बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नज़र में उनका आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

उत्तर: बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनका संयम और संतोष है। वे ‘भरे मन’ वाले व्यक्ति हैं, जिन्हें अपनी ज़रूरतों (जीरा और काला नमक) का स्पष्ट ज्ञान है। बाज़ार की चकाचौंध उन्हें ज़रा भी आकर्षित नहीं कर पाती।

हाँ, उनका आचरण निश्चित रूप से समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है। यदि सभी लोग भगत जी की तरह संतोषी हो जाएँ और केवल अपनी ज़रूरत के लिए बाज़ार का उपयोग करें, तो बाज़ार से ‘बाज़ारूपन’ (कपट, शोषण) खत्म हो जाएगा, जिससे समाज में सद्भाव और शांति बढ़ेगी।

प्रश्न 3: ‘बाज़ारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाज़ार की सार्थकता किसमें है?

उत्तर: ‘बाज़ारूपन’ से तात्पर्य बाज़ार में होने वाले कपट, धोखेबाजी, शोषण और सद्भाव की कमी से है। यह तब बढ़ता है जब विक्रेता फालतू सजावट से ग्राहकों को ठगता है और ग्राहक अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ का घमंड दिखाने के लिए फालतू चीज़ें खरीदते हैं।

बाज़ार को सार्थकता: भगत जी जैसे व्यक्ति, जो अपनी ज़रूरत को ठीक-ठीक जानते हैं और केवल ज़रूरत का सामान खरीदते हैं, वे बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं।

बाज़ार की सार्थकता: बाज़ार की असली सार्थकता ‘आवश्यकता के समय काम आने’ में है, न कि दिखावे या शोषण में।

प्रश्न 4: बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: यह बात ऊपरी तौर पर सही है कि बाज़ार ग्राहक में कोई भेद-भाव नहीं करता, वह केवल पैसे (क्रय शक्ति) को पहचानता है। इस दृष्टि से वह एक प्रकार की सामाजिक समता स्थापित करता है।

लेकिन यह समता भ्रामक और अधूरी है। यह समता केवल ‘आर्थिक’ आधार पर है। वास्तव में, बाज़ार ‘पर्चेजिंग पावर’ के आधार पर एक नया भेदभाव पैदा करता है। वह अमीर (जिसके पास क्रय शक्ति है) और गरीब (जिसके पास क्रय शक्ति नहीं है) के बीच एक गहरी खाई और ईर्ष्या पैदा करता है। इसलिए, यह वास्तविक सामाजिक समता नहीं है।

प्रश्न 5: आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें- (क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ। (ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।

(क) जब पैसा शक्ति बना: (विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें) उदाहरण: समाज में अक्सर देखा जाता है कि एक अमीर व्यक्ति को कानून और व्यवस्था से भी रियायत मिल जाती है, जबकि गरीब व्यक्ति को छोटी सी गलती के लिए भी सज़ा मिलती है। बड़े अस्पतालों में महंगा इलाज केवल पैसे वाले ही करा पाते हैं। यह पैसे की शक्ति का परिचायक है।

(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई: (विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें) उदाहरण: कोरोना महामारी के दौरान, कई अमीर लोग भी पैसे होने के बावजूद अपने प्रियजनों के लिए अस्पताल में बेड या ऑक्सीजन नहीं खरीद पाए और उन्हें नहीं बचा सके। इसी प्रकार, पैसा मानसिक शांति या सच्चा प्रेम नहीं खरीद सकता। वहाँ पैसे की शक्ति काम नहीं आती।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1: ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ में बाज़ार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का ज़िक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए। (क) मन खाली हो (ख) मन खाली न हो (ग) मन बंद हो (घ) मन में नकार हो

उत्तर: (यह प्रश्न विद्यार्थियों के निजी अनुभव पर आधारित है।)

(क) मन खाली हो: जब मैं बिना कुछ सोचे-समझे दोस्तों के साथ मॉल चला जाता हूँ, तो वहाँ की सजावट देखकर कई ऐसी चीज़ें (जैसे फैंसी कपड़े, गैजेट्स) खरीद लेता हूँ, जिनकी मुझे कोई ज़रूरत नहीं होती। यह ‘खाली मन’ का उदाहरण है।

(ख) मन खाली न हो: जब मैं घर से लिस्ट बनाकर केवल ‘कॉपी और पेन’ खरीदने के लिए बाज़ार जाता हूँ, तो मैं सीधा स्टेशनरी की दुकान पर जाकर वही सामान लेता हूँ और वापस आ जाता हूँ। यह ‘भरा मन’ (भगत जी की तरह) का उदाहरण है।

(ग) मन बंद हो: ‘मन बंद’ करने का अर्थ है हठपूर्वक बाज़ार की हर चीज़ को नकारना। ऐसा करना असंभव है, क्योंकि मनुष्य की ज़रूरतें होती हैं। यह शून्य होने जैसा है जो केवल परमात्मा के लिए संभव है।

(घ) मन में नकार हो: यदि मन में बाज़ार के प्रति विद्रोह या नकार का भाव हो, तो भी हम उसका लाभ नहीं उठा सकते। यह भी एक प्रकार की हठधर्मिता है, जो सही नहीं है।

प्रश्न 2: ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?

उत्तर: पाठ में मुख्य रूप से तीन प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है:

  1. पर्चेजिंग पावर दिखाने वाले: जो ज़रूरत के लिए नहीं, बल्कि पैसा दिखाने के लिए खरीदते हैं (जैसे लेखक के पहले मित्र)।
  2. भ्रमित ग्राहक (खाली मन): जिन्हें पता नहीं क्या खरीदना है, इसलिए या तो सब कुछ खरीद लेते हैं या कुछ भी नहीं खरीद पाते (जैसे लेखक के दूसरे मित्र)।
  3. संतुष्ट ग्राहक (भरा मन): जो केवल अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं (जैसे भगत जी)।

(विद्यार्थी स्वयं को किसी एक श्रेणी में रख सकते हैं) मैं स्वयं को ज़्यादातर ‘संतुष्ट ग्राहक’ की श्रेणी में मानता हूँ, क्योंकि मैं बाज़ार जाने से पहले अपनी ज़रूरत की लिस्ट बनाता हूँ। हालाँकि, कभी-कभी ‘मन खाली’ होने पर मैं भ्रमित ग्राहक भी बन जाता हूँ।

प्रश्न 3: आप बाज़ार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाज़ार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाज़ार में नज़र आती है?

उत्तर: मॉल की संस्कृति: यह चकाचौंध, दिखावे और ‘पर्चेजिंग पावर’ के प्रदर्शन पर आधारित है। यहाँ सब कुछ सजा-धजा और महंगा होता है। यह ‘बाज़ारूपन’ का प्रतीक है, जहाँ मानवीय सद्भाव कम और दिखावा ज़्यादा होता है।

सामान्य बाज़ार/हाट: यहाँ दिखावा कम और ज़रूरतें ज़्यादा पूरी होती हैं। यहाँ मोल-भाव होता है, आपसी जान-पहचान और सद्भाव होता है। यह बाज़ार ‘आवश्यकता’ को पूरा करने पर केंद्रित होता है।

‘पर्चेजिंग पावर’ मुख्य रूप से ‘मॉल की संस्कृति’ वाले बाज़ारों में ही नज़र आती है।

प्रश्न 4: लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: हाँ, हम इस विचार से सहमत हैं। जब कोई वस्तु बहुत आवश्यक हो जाती है (जैसे महामारी में दवाइयाँ या ऑक्सीजन, या परीक्षा के समय गाइड), तो विक्रेता उस ‘आवश्यकता’ का फायदा उठाकर मनमानी कीमत वसूलता है। बाज़ार का यह नियम है कि माँग बढ़ने पर कीमत बढ़ती है। लेकिन जब यह माँग ‘आवश्यकता’ या ‘मजबूरी’ बन जाती है, तो यही नियम ‘शोषण’ का रूप धारण कर लेता है।

प्रश्न 5: स्त्री माया न जोड़े यहाँ ‘माया’ शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?

उत्तर: यहाँ ‘माया’ शब्द धन-संपत्ति या पैसा जोड़ने (संचय) की ओर संकेत कर रहा है।

लेखक के मित्र ने अपनी फालतू खरीदारी का दोष पत्नी पर डाला। लेकिन स्त्रियों का माया (पैसा) जोड़ना परिस्थितिवश है। भारतीय समाज में स्त्रियों को लंबे समय तक आर्थिक रूप से पुरुषों (पिता, पति, पुत्र) पर निर्भर रहना पड़ा है। भविष्य की अनिश्चितता, बच्चों की ज़रूरतें, और मुश्किल समय में आर्थिक संबल पाने की असुरक्षा ही वे परिस्थितियाँ हैं, जो उन्हें माया जोड़ने (बचत करने) के लिए विवश करती हैं।

भाषा की बात

प्रश्न 1: विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है… पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।

उत्तर:

(क) औपचारिक भाषा (गंभीर, तार्किक):

  1. “बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है।”
  2. “बाज़ार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना।”
  3. “वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है वह मायावी शास्त्र है वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

(ख) अनौपचारिक भाषा (बोलचाल, सहज):

  1. “मित्र बोले-कुछ न पूछो। बाज़ार है कि शैतान का जाल है?”
  2. “अजी आओ भी। इस आमंत्रण में यह खूबी है कि आग्रह नहीं है।”
  3. “पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है।”

प्रश्न 2: पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है… सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए…

उत्तर: सीधे पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्य:

  1. “कहीं आप भूल न कर बैठिएगा। इन पंक्तियों को लिखने वाला मैं चूरन नहीं बेचता हूँ।”
  2. “क्या जाने उस भोले आदमी को अक्षर-ज्ञान तक भी है या नहीं।”
  3. “पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है।”
  4. “मैं सोचने को हो आता हूँ कि हाय, ये ही माँ-बाप रह गए थे…”
  5. “लेकिन क्या लोकवैभव की यह व्यंग्य-शक्ति उस चूरन वाले अकिंचित्कर मनुष्य के आगे चूर-चूर होकर ही नहीं रह जाती?”

हाँ, ऐसे संबोधन पाठक को रचना से सीधे जोड़ते हैं और उसे लेखक के साथ संवाद करने का अहसास कराते हैं, जिससे रचना अधिक प्रभावशाली और पठनीय बन जाती है।

प्रश्न 3: नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए। (क) पैसा पावर है। (ख) …पर्चेजिंग पावर… (कोड मिक्सिंग)

उत्तर: पाठ से ‘कोड मिक्सिंग’ (अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग) के पाँच उदाहरण:

  1. “मूल में एक और तत्त्व की महिमा सविशेष है। वह तत्त्व है मनीबैग…”
  2. “पैसे की उस ‘पर्चेजिंग पावर‘ के प्रयोग में ही पावर का रस है।”
  3. “माल-असबाब, मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं।” (अरबी/फ़ारसी)
  4. पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।”
  5. “राह में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं।”

प्रभाव: यदि इन आगत शब्दों की जगह शुद्ध हिंदी पर्यायों (जैसे ‘पर्चेजिंग पावर’ की जगह ‘क्रय-शक्ति’) का प्रयोग किया जाए, तो भाषा थोड़ी कठिन और कम स्वाभाविक लग सकती है। ‘कोड मिक्सिंग’ भाषा को सहज, जीवंत और संप्रेषणीय (Communicable) बनाती है, क्योंकि ये शब्द आम बोलचाल में रच-बस गए हैं।

प्रश्न 4: नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए- (क) निर्बल ही… (ख) लोग संयमी भी… (ग) सभी कुछ तो… (निपात)

उत्तर: (विद्यार्थी स्वयं वाक्य बनाएँ)

‘ही’ का प्रयोग:

  1. भगत जी को जीरा ही चाहिए था।
  2. वह ही बाज़ार गया था।
  3. केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है।

‘भी’ का प्रयोग:

  1. मैं भी आपके साथ चलूँगा।
  2. उसने खाना भी नहीं खाया।
  3. वे संयमी भी होते हैं।

‘तो’ का प्रयोग:

  1. वे आए तो थे, पर रुके नहीं।
  2. मैंने तो उन्हें पहले ही चेताया था।
  3. बाज़ार जाओ तो मन खाली न हो।

तीनों निपात एक साथ:

  1. आज तो मुझे ही यह काम भी करना पड़ेगा।
  2. उसने तो भगत जी से भी ज़्यादा पैसे ही कमाए।

महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर (परीक्षा अभ्यास)

RBSE परीक्षा पैटर्न के अनुसार ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के सभी महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (MCQ, अति लघु, लघु, और दीर्घ) का अभ्यास करें। यह संग्रह आपकी परीक्षा की तैयारी को मजबूत करने और पूरे अंक लाने के लिए विशेष रूप से बनाया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भगत जी ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ में एक आदर्श ग्राहक और ‘भरे मन’ वाले व्यक्ति के प्रतीक हैं। वे बाज़ार के आकर्षण (जादू) में नहीं फँसते, क्योंकि वे संयमी और संतोषी हैं। वे केवल अपनी ज़रूरत (जीरा, काला नमक) का सामान खरीदते हैं और बाज़ार को उसकी सच्ची सार्थकता देते हैं।

‘बाज़ारूपन’ से लेखक का तात्पर्य बाज़ार में होने वाले कपट, धोखेबाजी और शोषण से है। यह तब बढ़ता है जब लोग ज़रूरत के बजाय अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ दिखाने के लिए बाज़ार का उपयोग करते हैं, जिससे सद्भाव नष्ट होता है और ग्राहक-विक्रेता का रिश्ता केवल शोषक और शोषित का रह जाता है।

बाज़ार दर्शन NCERT समाधान PDF

विद्यार्थियों की सुविधा के लिए, हमने ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के सभी NCERT समाधान को एक PDF फाइल में संकलित किया है।

(इस PDF में आपको बोनस के तौर पर पाठ का सारांश और अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर भी मिलेंगे।)

इस लेख में कक्षा 12 हिंदी ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है। हमने विस्तृत बाज़ार दर्शन NCERT समाधान (Bazar Darshan Question Answer), ‘पाठ के आसपास’ और ‘भाषा की बात’ के हल प्रदान किए हैं।

हम आशा करते हैं कि ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के लिए यह विस्तृत NCERT समाधान और अध्ययन सामग्री आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी। ‘हिंदी की पाठशाला’ का उद्देश्य आपको सटीक और समझने में आसान संसाधन उपलब्ध कराना है।

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