बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या (Bazar Darshan Saprasang Vyakhya)

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या | कक्षा 12 हिंदी आरोह | Saprasang Vyakhya | Class 12 Hindi Aroh

नमस्ते विद्यार्थियों! इस लेख में हम कक्षा 12 हिंदी ‘आरोह’ के पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ के लिए सभी महत्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या (Saprasang Vyakhya) प्रदान कर रहे हैं। यह आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पाठ अवलोकन

विवरणजानकारी
पाठ का नाम बाज़ार दर्शन
लेखक जैनेंद्र कुमार
विधा विचार-प्रधान निबंध
मुख्य भाव उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद पर चिंतन

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या 1

“मित्र बोले-कुछ न पूछो। बाज़ार है कि शैतान का जाल है?… मनुष्य को सदा के लिए यह बेकार बना डाल सकता है।”

कठिन शब्दार्थ : शैतान का जाल: फँसाने का षड्यंत्र। बेहया: बेशर्म, जिसे लाज न आए। मूक: मौन, शांत। चाह: इच्छा। अभाव: कमी। परिमित: सीमित। अतुलित: जिसकी तुलना न हो सके, बहुत अधिक। विकल: बेचैन, व्याकुल। तृष्णा: तीव्र इच्छा, प्यास, लोभ।

संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित विचार-प्रधान निबंध ‘बाज़ार दर्शन’ से लिया गया है।

प्रसंग:
इस अंश में, लेखक बाज़ार के आकर्षक रूप और उपभोक्ता (ग्राहक) पर पड़ने वाले उसके विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं।

व्याख्या:
लेखक के मित्र बाज़ार के आकर्षण को ‘शैतान का जाल’ कहते हैं। वे बताते हैं कि बाज़ार को इतना सजा-सजाकर रखा जाता है कि कोई बेशर्म व्यक्ति ही होगा जो उसकी तरफ आकर्षित न हो। बाज़ार ग्राहकों को मौन रहकर (मूक) आमंत्रित करता है कि ‘आओ मुझे लूटो’। इस मौन आमंत्रण में ऐसी खूबी है कि वह ग्राहक के मन में इच्छा (चाह) जगाता है। यह इच्छा ही ग्राहक को ‘अभाव’ (कमी) महसूस कराती है। बाज़ार में खड़े होकर व्यक्ति को लगने लगता है कि उसके पास जो कुछ है वह बहुत कम (परिमित) है और उसे और अधिक चाहिए। लेखक कहते हैं कि यदि व्यक्ति को अपनी ज़रूरतों का सही ज्ञान न हो, तो बाज़ार उसे बेचैन, असंतोषी, लालची और ईर्ष्यालु बनाकर हमेशा के लिए बेकार कर सकता है।

विशेष:
1. लेखक ने बाज़ार के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का सटीक चित्रण किया है।
2. ‘शैतान का जाल’ एक सशक्त रूपक (Metaphor) है।
3. भाषा सरल, सहज किंतु दार्शनिक भावों से युक्त है। ‘चाह मतलब अभाव’ एक सूक्तिपरक वाक्य है।

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या 2

“बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है।… बल्कि खलल ही डालती है।”

कठिन शब्दार्थ : रूप का जादू: बाहरी सुंदरता का आकर्षण। मर्यादा: सीमा, लिमिट। मन खाली होना: ज़रूरत का ठीक-ठीक पता न होना। खलल: बाधा, रुकावट। गिल्टी: ग्रंथि, गाँठ (यहाँ: अहंकार)।

संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित विचार-प्रधान निबंध ‘बाज़ार दर्शन’ से लिया गया है।

प्रसंग :
इस अंश में लेखक ‘बाज़ार के जादू’ के स्वरूप और उसके असर करने की सबसे मुख्य परिस्थिति (खाली मन और भरी जेब) का वर्णन कर रहे हैं।

व्याख्या:
लेखक बाज़ार के आकर्षण की तुलना ‘जादू’ से करते हैं। यह जादू आँखों के रास्ते सीधा मन पर असर करता है। जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही बाज़ार के जादू की भी एक सीमा है। यह जादू तब सबसे ज़्यादा असर करता है जब व्यक्ति की ‘जेब भरी हो, और मन खाली हो’। ‘मन खाली’ होने का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी ज़रूरत का स्पष्ट पता नहीं है। ऐसी स्थिति में बाज़ार की अनेकों चीज़ों का निमंत्रण उस तक पहुँच जाता है और जेब भरी होने के कारण वह फालतू चीज़ें खरीदने लगता है। उसे लगता है कि सभी सामान ज़रूरी हैं और आराम बढ़ाने वाले हैं। लेकिन जब इस जादू का असर उतरता है, तब पता चलता है कि यह फालतू (फैंसी) चीज़ें आराम नहीं, बल्कि जीवन में बाधा (खलल) ही डालती हैं।

विशेष:
1. लेखक ने उपभोक्तावादी मानसिकता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है।
2. ‘जेब भरी हो, और मन खाली हो’ – यह इस पाठ का केंद्रीय और सूक्तिपरक वाक्य है।
3. भाषा तत्सम शब्दों (मर्यादा, खलल) से युक्त, विश्लेषणात्मक है।

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या 3

“देखता हूँ कि खुली आँख, तुष्ट और मग्न, वह चौक बाज़ार में से चलते चले जाते हैं।… भगत जी से बेचारी का कल्याण ही चाहते हैं।”

कठिन शब्दार्थ: तुष्ट: संतुष्ट, तृप्त। मग्न: डूबा हुआ, खुश। पसोपेश: दुविधा, असमंजस। अप्रीति: बैर, नफरत। रिक्त: खाली। प्रतीति: विश्वास, ज्ञान। चाँदनी: (यहाँ अर्थ है) बाज़ार की सजावट, चकाचौंध।

संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित विचार-प्रधान निबंध ‘बाज़ार दर्शन’ से लिया गया है।

प्रसंग :
इस अंश में, लेखक ‘भगत जी’ के उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट कर रहे हैं कि एक ‘भरा मन’ (संतुष्ट) वाला व्यक्ति किस प्रकार बाज़ार के आकर्षणों से अछूता रहता है।

व्याख्या:
लेखक बताते हैं कि भगत जी बाज़ार से आँखें बंद करके नहीं चलते, बल्कि वे खुली आँख से, संतुष्ट और प्रसन्न भाव से बाज़ार के बीच से निकल जाते हैं। उन्हें बाज़ार का आकर्षण देखकर कोई दुविधा नहीं होती। उनके मन में बढ़िया माल के प्रति कोई नफरत (अप्रीति) भी नहीं है, क्योंकि उनका मन खाली नहीं है, बल्कि भरा हुआ है। वे बाज़ार से हठपूर्वक मुँह नहीं मोड़ते, लेकिन वे रुकते सिर्फ छोटी-सी पंसारी की दुकान पर हैं। उन्हें इस बात का पक्का विश्वास (प्रतीति) है कि उन्हें केवल जीरा और काला नमक चाहिए। जैसे ही वे अपनी ज़रूरत का सामान ले लेते हैं, उनके लिए सारा बाज़ार (चाँदनी चौक) व्यर्थ हो जाता है। बाज़ार की चकाचौंध उन्हें ज़रा भी आकर्षित नहीं कर पाती, क्योंकि वे अपनी ज़रूरत को लेकर स्पष्ट हैं।

विशेष:
1. भगत जी एक आदर्श ग्राहक और ‘भरे मन’ वाले व्यक्ति के प्रतीक हैं।
2. यह अंश ‘गांधीवादी संयम’ और ‘संतोष’ के महत्व को दर्शाता है।
3. भाषा चित्रात्मक है (जैसे ‘खुली आँख, तुष्ट और मग्न’)।

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या 4 (उपसंहार)

“ऐसे बाज़ार को बीच में लेकर लोगों में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता… वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है वह मायावी शास्त्र है वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

कठिन शब्दार्थ: गाहक: ग्राहक, खरीदार। बेचक: बेचने वाला, विक्रेता। घात में होना: धोखा देने के अवसर की तलाश में होना। शोषण: दूसरे के श्रम का अनुचित लाभ उठाना (Exploitation)। औंधा: उल्टा, व्यर्थ। मायावी: भ्रामक, छल करने वाला। अनीति-शास्त्र: नीति (नैतिकता) के विरुद्ध शास्त्र।

संदर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित, जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित विचार-प्रधान निबंध ‘बाज़ार दर्शन’ से लिया गया है। यह निबंध का अंतिम अंश (उपसंहार) है।

प्रसंग:
इस अंतिम अंश में, लेखक ‘बाज़ारूपन’ (कपट) से भरे बाज़ार को मानवता के लिए हानिकारक बताते हुए ऐसे अर्थशास्त्र की कड़ी आलोचना कर रहे हैं जो कपट को बढ़ावा देता है।

व्याख्या:
लेखक निष्कर्ष देते हुए कहते हैं कि जब बाज़ार में ‘बाज़ारूपन’ (कपट) आ जाता है, तब वह अपनी सार्थकता खो देता है। तब बाज़ार ज़रूरतों को पूरा करने की जगह नहीं रह जाता, बल्कि शोषण का केंद्र बन जाता है। लोगों में सद्भाव खत्म हो जाता है और वे एक-दूसरे को भाई या पड़ोसी न समझकर केवल ग्राहक और विक्रेता समझते हैं, जो एक-दूसरे को ठगने की फिराक में रहते हैं। ऐसे बाज़ार मानवता के लिए एक विडंबना (Tragedy) हैं। लेखक कहते हैं कि जो अर्थशास्त्र ऐसे कपटपूर्ण बाज़ार को बढ़ावा देता है या उसका समर्थन करता है, वह अर्थशास्त्र (Economics) वास्तव में उल्टा, भ्रामक और ‘अनीति-शास्त्र’ (Immoral Science) है।

विशेष:
1. यह गद्यांश निबंध का सार और लेखक का अंतिम निर्णय प्रस्तुत करता है।
2. लेखक ने ‘अर्थशास्त्र’ को ‘अनीति-शास्त्र’ कहकर उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था पर गहरा व्यंग्य किया है।
3. भाषा दृढ़, निर्णायक और वैचारिक रूप से प्रखर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘सप्रसंग व्याख्या’ का अर्थ है किसी गद्यांश या पद्यांश की प्रसंग (context) के साथ व्याख्या करना। इसमें मुख्य रूप से चार भाग होते हैं: संदर्भ (पाठ और लेखक का नाम), प्रसंग (उस अंश में क्या बताया गया है), व्याख्या (सरल अर्थ) और विशेष (भाषा, शैली या अलंकार)।

संदर्भ’ यह बताता है कि गद्यांश कहाँ से लिया गया है (जैसे- पुस्तक ‘आरोह भाग-2’, पाठ ‘बाज़ार दर्शन’, लेखक ‘जैनेंद्र कुमार’)। जबकि ‘प्रसंग’ यह बताता है कि उस गद्यांश में किस बारे में बात हो रही है (जैसे- ‘इस अंश में लेखक बाज़ार के जादू के प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं’)।

‘बाज़ारूपन’ का अर्थ है बाज़ार में कपट और धोखेबाजी का बढ़ना। जब लोग ज़रूरत के लिए नहीं, बल्कि अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ दिखाने के लिए सामान खरीदते हैं, तो बाज़ार में सद्भाव खत्म हो जाता है और केवल शोषण व कपट ही रह जाता है।

बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या PDF

विद्यार्थियों की सुविधा के लिए, हमने ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ की सभी महत्वपूर्ण सप्रसंग व्याख्या को एक PDF फाइल में संकलित किया है।

(इस PDF में आपको बोनस के तौर पर पाठ का सारांश और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर भी मिलेंगे।)

इस लेख में, हमने ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के सभी महत्वपूर्ण गद्यांशों की बाज़ार दर्शन सप्रसंग व्याख्या (Bazar Darshan Saprasang Vyakhya) को शामिल किया है। यह गाइड आपको परीक्षा के लिए संदर्भ, प्रसंग, सरल अर्थ और विशेष लिखने में मदद करेगी।

हम आशा करते हैं कि ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ की सप्रसंग व्याख्या पर आधारित यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा। यह आपको परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मदद करेगा।

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